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दिल्ली Industrial Tribunal का आदेश: DTC ड्राइवर को 2010 से पक्का करे। सिर्फ 1 cm कम लंबाई पर नौकरी छीन ली थी।

DTC driver regularisation case – Industrial Tribunal orders regularisation from 2010 after illegal termination over 1 cm height

Industrial Tribunal-II, Rouse Avenue Courts, दिल्ली | Award: 18.07.2026

सोचिए, आप आठ साल से एक ही नौकरी कर रहे हैं। रोज़ duty पर पहुंचते हैं, दिल्ली की भीड़ भरी सड़कों पर बस चलाते हैं, सवारियों को उनकी मंज़िल तक पहुंचाते हैं। आपके काम पर कभी कोई शिकायत नहीं आती। और फिर एक दिन, जब आपको पक्का (regular) करने की बारी आती है, आपसे कहा जाता है: आपकी लंबाई 1 cm कम है, आपकी नौकरी खत्म।

1 cm। मोटे तौर पर उंगली के एक नाखून जितनी चौड़ाई।

यह किसी फिल्म की कहानी नहीं है। दिल्ली परिवहन निगम (DTC) के एक contract ड्राइवर, दर्शन कुमार, के साथ यही हुआ। और सबसे हैरानी की बात यह है कि DTC को यह कमी 2018 में पता नहीं चली थी। उसके अपने medical में यह बात 2010 में ही, भर्ती के कुछ महीने बाद, दर्ज हो चुकी थी।

अब दिल्ली के Industrial Tribunal-II ने DTC की इस कार्रवाई को गैरकानूनी ठहराया है। Tribunal ने साफ कहा कि DTC उस सवाल का कोई जवाब नहीं दे पाया जो इस कहानी को पढ़ने वाले हर इंसान के मन में आएगा: अगर 1 cm इतनी बड़ी कमी थी, तो आठ साल तक उन्हें Driver क्यों रखा?

यह फैसला सिर्फ एक ड्राइवर का नहीं है। यह उस पूरे चलन पर सवाल है जिसमें पक्का काम सालों तक contract के नाम पर कराया जाता है, और पक्का करने की बारी आते ही कोई बहाना ढूंढ लिया जाता है।

दर्शन कुमार 2010 में DTC में contract पर Driver लगे। Salary महीने की तय रकम नहीं थी, बल्कि जितने किलोमीटर बस चलाई, उसके हिसाब से मिलती थी: पहले ₹4 प्रति किलोमीटर, बाद में ₹5।

इसके बाद वो DSSSB द्वारा आयोजित DTC की Driver भर्ती में भी सफल हुए। Written test, driving test और medical की पूरी प्रक्रिया से गुज़रे। चुने जाने के बाद DTC के Medical Board की report आई, जिसमें लिखा था कि उनकी लंबाई 161 cm है, जबकि नियम 162 cm का है।

DTC ने इस report के बावजूद उन्हें contract driver के तौर पर काम पर रखा। DTC के अपने जवाब के मुताबिक, शर्त यह थी कि वो कभी पक्का होने का दावा नहीं करेंगे।

इसके बाद करीब आठ साल तक contract हर बार आगे बढ़ता रहा। काम लगातार चलता रहा, और record पर उनके काम या बर्ताव को लेकर कोई शिकायत नहीं है।

2018 में जब उन्हें पक्का करने पर विचार हुआ, तो दोबारा medical कराया गया। फिर वही 1 cm निकला। Show cause notice आया, और फिर नौकरी खत्म कर दी गई। न charge-sheet, न inquiry, न notice pay, न मुआवज़ा। इसके बाद वो ढाई साल से ज़्यादा बेरोज़गार रहे।

कहानी का सबसे अजीब मोड़ 2021 में आया। जब मामला Tribunal में चल ही रहा था, DTC ने उसी ड्राइवर को, उसी लंबाई के साथ, फिर से contract पर बुला लिया।

असली समस्या: पक्का काम, कच्चा ठप्पा

यह case सिर्फ 1 cm का नहीं है। इसके पीछे एक बड़ी समस्या है जो सरकारी और अर्ध-सरकारी संस्थाओं में आम हो चुकी है।

Tribunal में DTC के अपने अधिकारी ने गवाही में माना कि contract ड्राइवर और पक्के ड्राइवर का काम और duty के घंटे बिल्कुल एक जैसे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि contract वाले को minimum wage मिलती है, और पक्के ड्राइवर को पूरा pay scale, भत्ते और बाकी फायदे।

यानी एक ही बस, एक ही सड़क, एक ही duty। लेकिन एक को कम पैसा, कोई सुरक्षा नहीं, और हर बार यह डर कि contract आगे बढ़ेगा या नहीं। और जब सालों बाद पक्का करने की बात आती है, तो कोई तकनीकी कमी सामने रख दी जाती है।

कानून क्या कहता है

इस फैसले को समझने के लिए पहले उन कानूनी नियमों को आसान भाषा में समझ लेते हैं, जिन पर Tribunal ने भरोसा किया।

1. “Contract खत्म, नौकरी खत्म” हर बार नहीं चलता

Industrial Disputes Act में Retrenchment (छंटनी) से पहले employer को कुछ ज़रूरी कदम उठाने होते हैं। Section 25F के तहत worker को एक महीने का notice या उसकी salary और retrenchment compensation (छंटनी का मुआवज़ा) देना होता है, और सरकार को सूचना देनी होती है।

Employers अक्सर कहते हैं कि contract खत्म होने पर नौकरी जाना छंटनी है ही नहीं, क्योंकि Section 2(oo)(bb) ऐसे मामलों को छंटनी से बाहर रखती है। लेकिन Supreme Court (S.M. Nilajkar case) के मुताबिक यह छूट तभी मिलती है जब worker किसी temporary project या scheme के लिए रखा गया हो, और नौकरी उस project के खत्म होने के साथ खत्म हो। इसे साबित करने का burden of proof (ज़िम्मेदारी) employer पर होता है। जो काम हमेशा चलता है, जैसे बस चलाना, उस पर यह छूट लागू नहीं होती।

2. Contract worker को भी सुनवाई का हक है

अगर नौकरी किसी आरोप या “कमी” के आधार पर, सज़ा के तौर पर ली जा रही है, तो worker contract पर हो या पक्का, उसे पहले सुना जाना चाहिए और inquiry होनी चाहिए। Supreme Court (K.C. Joshi case) कह चुका है कि जब सरकारी कार्रवाई किसी की रोज़ी पर असर डाले या उस पर दाग लगाए, तो natural justice (सुनवाई का बुनियादी हक) का पालन ज़रूरी है।

3. सालों तक “अस्थायी” रखना: unfair labour practice

Industrial Disputes Act की Fifth Schedule में unfair labour practices (गलत labour तरीकों) की list है। इसका Item 10 कहता है कि workers को सालों तक temporary या casual रखना, ताकि उन्हें permanent का दर्जा और फायदे न देने पड़ें, unfair labour practice है। Item 5 के तहत बदले की भावना से (victimization) या अपने अधिकार का गलत इस्तेमाल करके किसी को निकालना भी unfair labour practice है। Section 25T ऐसे तरीकों को मना करती है, और Section 25U में इसकी सज़ा है।

4. मजबूरी में sign की गई शर्त हक नहीं छीनती

Supreme Court के Brojo Nath Ganguly और Dhirendra Chamoli जैसे फैसलों का मूल विचार यह है कि कम salary वाला worker, नौकरी की ज़रूरत में, employer की हर शर्त मान लेता है। दोनों की मोलभाव की ताकत बराबर नहीं होती। इसलिए “मैं पक्का होने का दावा नहीं करूंगा” जैसी शर्त को worker के कानूनी हक खत्म करने का ज़रिया नहीं बनाया जा सकता।

5. Equal Pay for Equal Work

Supreme Court (State of Punjab बनाम Jagjit Singh) ने माना है कि जो temporary workers पक्के कर्मचारियों जैसा ही काम करते हैं, उन पर भी “बराबर काम, बराबर वेतन” का सिद्धांत लागू होता है।

6. गलत तरीके से निकाले गए worker को पूरी back wages

Supreme Court (Deepali Gundu Surwase case) के मुताबिक, अगर termination गैर-कानूनी है, तो आमतौर पर worker को नौकरी में वापसी और पूरी back wages (रुकी हुई salary) मिलती हैं। अगर employer कहता है कि worker इस बीच कहीं और कमा रहा था, तो यह साबित करना employer की ज़िम्मेदारी है।

7. Tribunal के पास गलती सुधारने की ताकत

Supreme Court की Constitution Bench (Bidi, Bidi Leaves’ and Tobacco Merchants Association case) कह चुकी है कि Industrial Tribunal सिर्फ contract की शर्तों तक सीमित नहीं है। वो सामाजिक न्याय और industrial peace के लिए नए हक भी दे सकता है। इसी आधार पर unfair labour practice साबित होने पर Tribunal regularization का आदेश दे सकता है।

Tribunal ने DTC से क्या कहा

इन नियमों को इस case पर लागू करते हुए Tribunal ने DTC की हर दलील को एक-एक करके परखा।

“यह तो contract खत्म होना था”: DTC ने यह दलील अपने लिखित जवाब में दी ही नहीं थी, सिर्फ आखिरी बहस में उठाई। फिर भी Tribunal ने इस पर विचार किया, और यह नहीं टिकी। बस चलाने का काम perennial (हमेशा चलने वाला) है, कोई छोटा project नहीं। DTC के अपने अधिकारी ने माना कि भर्ती test और medical के ज़रिए हुई थी। इसलिए यह छंटनी थी, और Section 25F का पालन नहीं हुआ।

“Contract worker की inquiry ज़रूरी नहीं”: Tribunal ने कहा कि यह नौकरी का सामान्य अंत नहीं, बल्कि एक कमी के आधार पर दी गई सज़ा थी। ऐसे में बिना inquiry के निकालना natural justice के खिलाफ है, और termination order शुरू से ही void (अमान्य) है। Tribunal के मुताबिक सुनवाई का हक daily wager, contract या permanent, किसी भी category में फर्क नहीं करता।

1 cm की दलील: यहां Tribunal की टिप्पणी सबसे साफ थी। DTC ने कमी जानते हुए उन्हें रखा, सालों तक काम लिया, और case के बीच दोबारा रख लिया। वो कभी यह नहीं दिखा पाया कि 1 cm कम होने से driving या काम पर कोई असर पड़ा। लंबाई का सवाल सिर्फ पक्का करने के वक्त उठाना, Tribunal के शब्दों में, मनमानी (arbitrariness) है। Tribunal ने worker के बारे में लिखा कि वो “more sinned against than sinning” हैं, यानी उनकी गलती कम और उनके साथ हुई गलती कहीं ज़्यादा है।

Tribunal ने यह भी दर्ज किया कि worker के मुताबिक उनसे भी कम लंबाई वाले दो साथी ड्राइवरों को पक्का किया गया, और DTC ने इस बात को न तो नकारा और न ही इस पर कोई सवाल उठाया।

“बात छिपाई गई”: DTC ने कहा कि worker ने 2021 में दोबारा रखे जाने की बात Tribunal से छिपाई। Tribunal ने कहा कि दोबारा रखने वाला तो खुद DTC था, और जो बात सामने वाली पार्टी को पहले से पता हो, उसे छिपाना नहीं कहा जा सकता। Worker ने पूछे जाने पर यह बात खुद मानी भी थी। Medical report पर भी यही बात लागू हुई, क्योंकि medical DTC ने ही करवाया था।

“उसने खुद sign किया था”: Tribunal ने कहा कि worker की “सहमति” DTC को unfair labour practice का license नहीं देती। कम salary वाले worker की आर्थिक हालत में बराबरी के मोलभाव की उम्मीद नहीं की जा सकती।

पक्का होने का हक: Tribunal ने पाया कि काम लगातार और स्थायी प्रकृति का था, worker की योग्यता पर कोई सवाल नहीं था, काम और बर्ताव संतोषजनक थे, और DTC ने खुद उन्हें regularization के लिए consider किया था। इसका मतलब था कि उस वक्त Driver के पद मौजूद थे। ऐसे में सालों तक contract पर रखना Fifth Schedule के Item 10 के तहत unfair labour practice है, और Tribunal इसे आगे जारी नहीं रहने दे सकता।

फैसला: Tribunal ने क्या आदेश दिया

18.07.2026 के award में Tribunal ने कहा:

  1. Termination गैर-कानूनी: 2018 में की गई termination illegal और unjustified है।
  2. Back wages: नौकरी से निकाले जाने से लेकर 2021 में दोबारा रखे जाने तक (06.09.2018 से 05.03.2021) की पूरी back wages, continuity of service (नौकरी में कोई break न माना जाए) और सारे consequential benefits (बाकी हक और फायदे)।
  3. Regularization: 2010 में join करने की पहली तारीख (29.09.2010) से Driver के पद पर पक्का माना जाएगा।
  4. Equal Pay for Equal Work: पक्के ड्राइवर की salary और उन्हें मिली रकम के बीच का पूरा फर्क, सारे फायदों के साथ।
  5. 60 दिन की deadline: DTC को 60 दिनों में award लागू करना है। ऐसा न होने पर 06.01.2020 से पूरी रकम मिलने तक 8% सालाना ब्याज़ देना होगा।

Worker की तरफ से case Delhi Labour Union के ज़रिए रखा गया। Advocate राजीव अग्रवाल ने worker की तरफ से case लड़ा।

आगे क्या

DTC के पास award लागू करने के लिए 60 दिन हैं। वो award लागू करता है या इसे High Court में चुनौती देता है, यह देखना बाकी है। अगर ऐसा होता है, तो उसका update इसी article में जोड़ा जाएगा।

Contract workers और employers, दोनों के लिए सबक

Workers के लिए:

  • अगर आपका काम हमेशा चलने वाला है (जैसे Driver, safai, security), तो सालों तक contract पर रखे जाने को चुनौती दी जा सकती है।
  • Contract में लिखी “पक्का होने का दावा नहीं करूंगा” जैसी शर्त अपने आप आपके खिलाफ नहीं जाती।
  • किसी आरोप या कमी के नाम पर नौकरी ली जाए, तो contract पर होने के बावजूद आपको सुनवाई का हक है।
  • नौकरी जाने के बाद अगर आप बेरोज़गार हैं, तो यह साफ कहें। कहीं और कमाई साबित करना employer की ज़िम्मेदारी है।
  • भर्ती, medical, contract renewal और salary के कागज़ संभालकर रखें।

Employers के लिए:

  • जो कमी सालों तक जानते हुए नज़रअंदाज़ की गई हो, उसे बाद में हटाने की वजह बनाना मुश्किल है।
  • स्थायी काम पर contract का लेबल लगाने से वो काम अस्थायी नहीं हो जाता।
  • Contract worker को भी, सज़ा के तौर पर हटाने से पहले, सुनवाई और inquiry ज़रूरी हैं।

यह सामान्य कानूनी जानकारी और जागरूकता के लिए है। यह किसी काम के लिए advertisement या solicitation नहीं है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

सिर्फ लंबे समय तक काम करने से हर contract worker automatically permanent नहीं हो जाता। Darshan Kumar के case में Tribunal ने continuous service, permanent और perennial nature का काम, qualifications, recruitment process, available posts और employer के conduct जैसे facts को साथ देखकर regularisation की relief दी।

अगर termination किसी allegation, misconduct या punitive/stigmatic कारण पर आधारित है, तो natural justice के principles लागू हो सकते हैं। इस case में Tribunal ने बिना departmental inquiry की गई termination को illegal माना।

इस case में Tribunal ने Darshan Kumar को regularisation के साथ regular Driver की salary और उन्हें मिली रकम के बीच का पूरा difference Equal Pay for Equal Work के principle पर देने का आदेश दिया।

Regularisation के समय medical examination में उनकी height prescribed 162 cm के मुकाबले 161 cm पाई गई। Article के अनुसार यही 1 cm का difference termination का प्रमुख मुद्दा बना, जबकि management को height की स्थिति पहले से मालूम थी.

Tribunal ने termination को illegal and unjustified माना, continuity of service और 06.09.2018 से 05.03.2021 तक full back wages दिए, Driver के पद पर 29.09.2010 से regularisation और Equal Pay for Equal Work के अनुसार salary difference व consequential benefits दिए.

Award के अनुसार DTC को 60 दिनों के भीतर इसे implement करना था; failure पर Award में 06.01.2020 से realization तक 8% annual interest का direction दिया गया है.

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