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दिल्ली हाई कोर्ट की चेतावनी: 14,000 Pending Cases पर सरकार नहीं मानी, अब Contempt का खतरा

Delhi High Court 14,000 pending cases पर सरकार को चेतावनी

Delhi High Court में 14,000 से अधिक Pending Cases का मुद्दा अब हज़ारों workers के समय पर न्याय से जुड़ा एक गंभीर सवाल बन गया है। यह सिर्फ एक case नहीं है — यह उन workers की लड़ाई की कहानी है जिनके industrial disputes सालों तक इसलिए लंबित रहते हैं क्योंकि cases का tribunals के बीच समान वितरण नहीं हो पाया।

दिल्ली में worker और employer के बीच के dispute सुनने के लिए कई Industrial Tribunals और Labour Courts काम करते हैं। लेकिन इनमें काम बराबर नहीं बंटा है। अकेले Central Government Industrial Tribunal No. I में 14,000 से ज़्यादा cases pending हैं — जबकि दूसरे tribunal पर इतना बोझ नहीं है।

मतलब साफ है: किसी worker का case किस tribunal में जाता है, यह सिर्फ किस्मत की बात बन गई है। अगर case उस overloaded tribunal में चला गया, तो सालों तक सुनवाई का इंतज़ार करना पड़ सकता है — चाहे case कितना भी सीधा क्यों न हो।

Delhi Labour Union ने उठाई आवाज़

Delhi Labour Union ने इस असमानता के खिलाफ Delhi High Court में एक Public Interest Litigation (PIL) दाखिल की — W.P.(C) 6158/2026। Advocate राजीव अग्रवाल और उनकी टीम ने union की तरफ से case रखा।

Union ने बताया कि उन्होंने पहले ही सरकार को दो बार representation दे चुके थे — 16 फरवरी 2026 और 13 मार्च 2026 को — यह मांग करते हुए कि सभी tribunals और Labour Courts के बीच pending cases को बराबर बांटा जाए। लेकिन कोई ठोस action नहीं हुआ, इसलिए union को Court का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा।

कानून पहले से मौजूद था

सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसके लिए कानून पहले से मौजूद है। Industrial Relations Code, 2020 की Section 92(3) साफ कहती है कि Central Government चाहे तो किसी State Government द्वारा बनाए गए tribunal को भी वे case सुनने का अधिकार दे सकती है, जहां असली “appropriate Government” Central Government होती है। यानी case redistribute करने का रास्ता कानून में पहले से मौजूद है — बस उसका इस्तेमाल नहीं हो रहा था।

दिल्ली हाई कोर्ट का आदेश (22 मई 2026)

Chief Justice Devendra Kumar Upadhyaya और Justice Tejas Karia की bench ने इस मामले को गंभीरता से लिया। Court ने कहा कि जब एक ही tribunal पर इतना ज़्यादा बोझ है, तो Central Government को सभी tribunals और Labour Courts के बीच cases को बराबर बांटने के लिए ज़रूरी कदम उठाने चाहिए।

Court ने Central Government को निर्देश दिया कि वह union के दोनों representations पर विचार करे और 2 महीने के भीतर इस पर उचित फैसला ले। Court ने यह भी कहा कि जो भी फैसला हो, वह union को भी बताया जाए।

जब सरकार ने समय पर काम नहीं किया

लेकिन 2 महीने की समयसीमा निकल जाने के बाद भी सरकार ने कोई फैसला नहीं लिया। इसके बजाय, समयसीमा खत्म होने के बाद सरकार ने Court में एक application दाखिल करके 2 और महीने का समय मांगा।

2 सितंबर 2026 को हुई सुनवाई में Court ने सरकार के इस रवैये पर साफ नाराज़गी जताई — Court ने कहा कि वह “Central Government के इस रवैये की सराहना नहीं करता” कि उसने तय समय में फैसला नहीं लिया। फिर भी, न्याय के हित में Court ने सरकार को 4 और हफ्तों का समय दिया — लेकिन साथ ही यह साफ चेतावनी भी दी कि अगर इस बार भी आदेश का पालन नहीं हुआ, तो ज़िम्मेदार authority को contempt of court का सामना करना पड़ सकता है।

यह case क्यों मायने रखता है

यह case किसी एक worker की लड़ाई नहीं है — यह उस systemic समस्या की लड़ाई है जो हज़ारों workers के case को सालों तक अटकाए रखती है। जब एक tribunal पर 14,000 cases का बोझ हो, तो वहां पहुंचने वाले हर worker को इंसाफ मिलने में सालों लग सकते हैं, चाहे उसका case कितना भी सही क्यों न हो।

Court का यह आदेश और साथ में दी गई contempt की चेतावनी, दोनों मिलकर एक साफ संकेत देते हैं: अदालत का आदेश सिर्फ कागज़ पर नहीं रह सकता, उसे समय पर लागू करना ही होगा। अब देखना यह है कि Central Government अगली समयसीमा — यानी अगले कुछ हफ्तों — के भीतर इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाती है या नहीं।

“इस विषय से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण मामलों और श्रमिक अधिकारों की जानकारी के लिए ये लेख भी पढ़ें: CGHS के 267 Workers का मामला“

यह article Delhi High Court में W.P.(C) 6158/2026, Delhi Labour Union vs. Union of India & Ors. मामले में पारित आदेशों (22.05.2026 और 02.09.2026) पर आधारित है। यह सामान्य कानूनी जानकारी और जागरूकता के लिए है। यह किसी काम के लिए advertisement या solicitation नहीं है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

मामला Industrial Tribunals और Labour Courts के बीच cases के असमान वितरण से जुड़ा है। Delhi Labour Union ने इस संबंध में W.P.(C) 6158/2026 के माध्यम से Delhi High Court का रुख किया।

Court ने Central Government को union की representations पर विचार कर दो महीने के भीतर उचित निर्णय लेने और उस निर्णय की जानकारी union को देने का निर्देश दिया।

निर्धारित समय में निर्णय न लिए जाने के बाद Court ने अतिरिक्त चार सप्ताह का समय देते हुए कहा कि आगे non-compliance की स्थिति में जिम्मेदार authority को contempt proceedings का सामना करना पड़ सकता है।

Cases का अधिक समान वितरण होने से अत्यधिक overloaded tribunal में लंबित industrial disputes के शीघ्र निस्तारण में सहायता मिल सकती है।

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