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CGHS के 267 Workers का मामला: 2006 से कानूनी लड़ाई और Supreme Court का फैसला

CGHS 267 workers Delhi High Court case

CGHS के 267 Data Entry Operators का यह मामला लंबे समय से चले आ रहे contractor-based employment और workers के regularisation के अधिकार से जुड़ा महत्वपूर्ण कानूनी मामला है। यह एक ऐसा judgment है जो हर उस worker के काम आएगा जो सालों से एक ही जगह काम कर रहा है, लेकिन उसका employer कागज़ों पर contractor बदल-बदल कर उसे “temporary” बनाए रखता है।

Central Government Health Scheme (CGHS) में 267 Data Entry Operator 2006 से काम कर रहे थे। सालों तक उनका काम, उनकी जगह, और उनका असली supervisor — सब कुछ वही रहा। बस एक चीज़ बार-बार बदलती रही: वह contractor जिसके ज़रिए उन्हें “outsource” किया गया था।

2006 से 2014 के बीच करीब 12 अलग-अलग vendors/contractors बदले गए — लेकिन workers वही बने रहे। जब CGHS ने 2014 में कुछ letters (21.01.2014 और 21.03.2014) भेजे और नए e-tendering notices जारी किए, तो worker को यह खतरा महसूस हुआ कि उसकी नौकरी कभी भी खत्म की जा सकती है। यहीं से उन्होंने Industrial Disputes Act के तहत dispute उठाया — तब वे अभी भी काम पर थे, नौकरी से निकाले नहीं गए थे।

23 अगस्त 2019 को Labour Court ने worker के पक्ष में award दिया: उन्हें नियमित (regularise) किया जाए, साथ ही शुरुआती नियुक्ति (initial engagement) से arrears व अन्य benefits भी दिए जाएं।

Labour Court में क्या साबित हुआ

Court के सामने evidence में यह साफ आया कि contractor भले ही बदलते रहे, लेकिन CGHS के officers ही हमेशा असली control में थे। CGHS के अपने गवाह ने खुद माना कि Chief Medical Officers (CMOs) ही worker की leave sanction करते थे, उन्हें ID card और appreciation letter जारी करते थे, और ज़रूरत पड़ने पर termination order भी वही देते थे।

एक और गवाही NICSI (जिसे CGHS ने बीच का vendor बताया था) के officer की थी। उसने खुद स्वीकार किया कि NICSI ने worker को कभी न तो appoint किया, न terminate किया, और न ही कभी उनके खिलाफ कोई disciplinary process चलाया।

एक अहम सबूत संसद (Parliament) में दिए गए एक बयान का भी था, जिसमें तत्कालीन Health Minister ग़ुलाम नबी आज़ाद ने खुद कहा था कि ये Data Entry Operator असल में CGHS की खाली पड़ी LDC (Lower Division Clerk) posts के against काम कर रहे थे।

CGHS की दलीलें और Court का फैसला

CGHS ने अपने बचाव में कई दलीलें दीं — कि worker को सिर्फ 5-7 साल की सीमित अवधि के लिए रखा गया था, कि कोई regular DEO post ही नहीं है, कि कोई advertisement या interview नहीं हुआ, कोई appointment order नहीं दिया गया, कोई salary slip नहीं दी गई, और worker के साथ CGHS का सीधा contract (privity of contract) कभी था ही नहीं।

Court ने evidence के आधार पर इन सभी दलीलों को खारिज कर दिया। सबसे अहम बात: Court ने कहा कि CGHS और placement agency/contractor के बीच का contract खुद ही bogus और sham (यानी दिखावे का) पाया गया, तो कानूनी तौर पर CGHS और worker के बीच सीधा employer-employee relationship अपने आप बन जाता है। Court ने साफ कहा कि CGHS ने यह पूरा ढांचा सिर्फ इसलिए बनाया था ताकि direct employer-employee relationship को छुपाया जा सके।

Delhi High Court का फैसला – 17 दिसंबर 2025

CGHS ने पहले single judge के सामने हारने के बाद, Justice Dinesh Mehta और Justice Mini Pushkarna की Division Bench में Letters Patent Appeal (LPA 3/2025) दाखिल की। worker की तरफ से advocate राजीव अग्रवाल और उनकी टीम ने case लड़ा।

17 दिसंबर 2025 को Court ने Labour Court के award को कुछ बदलावों के साथ बरकरार रखा:

  1. जिन worker ने award की तारीख तक काम जारी रखा, उन्हें नियुक्ति के एक साल पूरे होने पर regular employee माना जाएगा — बशर्ते वे बाकी eligibility पूरी करते हों।
  2. DEO/LDC की खाली posts पर औपचारिक नियमितीकरण के आदेश 90 दिनों के भीतर जारी किए जाएं।
  3. CGHS को 1 अप्रैल 2026 से DEO/LDC post के हिसाब से पूरी सैलरी और allowances देनी होगी।
  4. worker को arrears सिर्फ Labour Court के award की तारीख — यानी 23 अगस्त 2019 — से मिलेंगे, न कि 2006 की उनकी शुरुआती नियुक्ति से।
  5. अगर arrears 30 जून 2026 तक नहीं चुकाए गए, तो CGHS को उस पर 6% सालाना ब्याज भी देना होगा।

Court ने यह भी कहा कि worker को 10 से 20 साल तक बिना नियमित किए इस तरह काम पर रखे रहना “exploitation” और unfair practice है, और अगर उन्हें अब भी नियमित न किया जाए तो यह Constitution के Article 14 के तहत मनमाना (arbitrary) और गैरकानूनी होगा।

10 जुलाई 2026 का Review Order

फैसले के कुछ महीनों बाद, advocate राजीव अग्रवाल ने कोर्ट के सामने एक Review Petition में यह बात रखी कि 17 दिसंबर 2025 के फैसले में एक factual गलती रह गई थी। Court ने यह मानकर फैसला लिखा था कि जब worker Labour Court पहुंचे थे, तब तक उनकी नौकरी terminate हो चुकी थी — जबकि असल में ऐसा नहीं था। worker उस वक्त भी नौकरी में ही था, और उन्होंने सिर्फ CGHS के letters और e-tendering notices से मिले खतरों के जवाब में dispute उठाया था।

CGHS के वकील ने भी कोर्ट में यह मान लिया कि यह बात सही है। 10 जुलाई 2026 को कोर्ट ने अपने फैसले में सुधार किया, लेकिन साथ ही यह भी साफ कर दिया कि इस सुधार से फैसले के final नतीजे पर कोई फर्क नहीं पड़ता। worker का नियमितीकरण वाला आदेश पहले जैसा ही बना रहेगा।

इसी सुनवाई में राजीव अग्रवाल ने एक अंदेशा भी जताया — कि CGHS “eligibility check” के नाम पर worker के नियमितीकरण में रुकावट डाल सकता है। Court ने इस पर साफ किया कि हर worker की eligibility उसकी शुरुआती नियुक्ति की तारीख पर ही देखी जाएगी, न कि 2019 वाले award की तारीख पर — बशर्ते वह worker 2019 के award की तारीख तक नौकरी में मौजूद रहा हो।

Supreme Court में CGHS की चुनौती और Workers की SLP

17 दिसंबर 2025 के Delhi High Court के फैसले के बाद CGHS ने इस फैसले को Supreme Court में चुनौती दी। CGHS की ओर से दाखिल Special Leave Petition (SLP), Diary No. 39943/2026, पर Supreme Court ने 31 जुलाई 2026 को सुनवाई की। Court ने देरी को condone करते हुए SLP को entertain करने का कोई पर्याप्त आधार नहीं पाया और उसे dismiss कर दिया।

इसके बाद workers की ओर से भी Delhi High Court के फैसले में arrears और monetary relief से जुड़े हिस्से को लेकर Supreme Court का रुख किया गया। Workers की SLP, Diary No. 47297/2026, 5 अगस्त 2026 को दाखिल हुई और उपलब्ध case-status records के अनुसार 3 सितंबर 2026 तक यह proceeding जारी थी।

इस तरह, Supreme Court में CGHS की चुनौती का एक चरण 31 जुलाई 2026 को SLP के खारिज होने के साथ समाप्त हुआ, जबकि workers की ओर से arrears/monetary relief से जुड़ी चुनौती अलग proceeding के रूप में आगे बढ़ रही है।

यह Judgment Workers के लिए क्यों महत्वपूर्ण है

यह फैसला उन तमाम government और semi-government departments के लिए एक मिसाल है जहां असली काम, जगह, और supervision एक ही रहते हैं, लेकिन बीच में contractor की परत बार-बार बदलकर employer अपनी ज़िम्मेदारी से बचने की कोशिश करता है। Court ने साफ कर दिया कि अगर contract sham पाया जाए, तो worker का हक सिर्फ इसलिए खत्म नहीं हो सकता कि उसे किसी और के नाम पर रखा गया था।

हालांकि, arrears सिर्फ 2019 से मिलने की बात पर workers अभी भी संतुष्ट नहीं हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस हिस्से को अब Supreme Court में चुनौती दी गई है, जहां worker की मांग है कि उन्हें arrears उनकी शुरुआती नियुक्ति यानी 2006 से ही मिलें।

यह मामला वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के समक्ष विचाराधीन है। दिल्ली उच्च न्यायालय का 17 दिसंबर 2025 का फैसला और 10 जुलाई 2026 का समीक्षा आदेश इस मामले के न्यायिक इतिहास का हिस्सा हैं। सर्वोच्च न्यायालय में चल रही कार्यवाही का अंतिम परिणाम अभी निर्धारित नहीं हुआ है। यह सामग्री किसी भी प्रकार के विज्ञापन या कानूनी सेवा के लिए आग्रह (solicitation) के रूप में नहीं है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

CGHS में 267 Data Entry Operators वर्ष 2006 से काम कर रहे थे। वर्ष 2006 से 2014 के बीच अलग-अलग contractors/vendors बदलते रहे, लेकिन workers का काम, कार्यस्थल और supervision काफी हद तक वही रहा। Workers ने इस व्यवस्था को चुनौती देते हुए Industrial Disputes Act के तहत dispute उठाया।

23 अगस्त 2019 को Labour Court ने workers के पक्ष में award दिया और उन्हें regularise करने का आदेश दिया। साथ ही शुरुआती नियुक्ति से arrears और अन्य benefits देने का निर्देश दिया गया था।

Delhi High Court की Division Bench ने Labour Court के award को कुछ बदलावों के साथ बरकरार रखा। Court ने कहा कि पात्र workers को नियमित employee माना जाए और DEO/LDC की खाली posts पर regularisation की प्रक्रिया पूरी की जाए। 1 अप्रैल 2026 से संबंधित post के अनुसार salary और allowances देने का भी निर्देश दिया गया।

Delhi High Court के 17 दिसंबर 2025 के फैसले के अनुसार arrears 23 अगस्त 2019, यानी Labour Court के award की तारीख से दिए जाने थे, न कि 2006 की शुरुआती नियुक्ति से। आपके लेख के अनुसार, इस हिस्से को workers ने Supreme Court में चुनौती दी है और इस मामले में अंतिम परिणाम अभी आना बाकी है।

10 जुलाई 2026 को Delhi High Court ने अपने पहले फैसले में एक factual correction किया। Court के सामने यह स्पष्ट किया गया कि workers ने dispute उठाते समय नौकरी नहीं खोई थी, बल्कि वे उस समय भी काम कर रहे थे। Court ने इस तथ्य को सुधारते हुए स्पष्ट किया कि इससे पहले दिए गए regularisation के अंतिम परिणाम में कोई बदलाव नहीं हुआ। साथ ही eligibility को शुरुआती नियुक्ति की तारीख के आधार पर देखने की बात कही गई, बशर्ते worker 2019 के award की तारीख तक नौकरी में मौजूद रहा हो।

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