
दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 23-24 सालों से अनुबंध पर काम कर रहे सहायक नर्स मिडवाइफ (ANM) कर्मचारियों के हक में बड़ा आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि ये कर्मचारी इतने वर्षों से लगातार सेवा दे रहे हैं, इसलिए उन्हें स्थायी कर्मचारियों की तरह सुविधाएं मिलनी चाहिए। ANMs का यह केस हॉस्पिटल एम्प्लॉईज़ यूनियन, नई दिल्ली की तरफ से लड़ा गया।
सरकारी योजना में ‘ठेकेदारी सिस्टम’ का खेल
मामला दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण निदेशालय से जुड़ा हुआ है, जिसमें ‘रिप्रोडक्टिव एंड चाइल्ड हेल्थ (RCH)’ योजना के तहत ANM कर्मचारियों को साल 2000-2001 में अनुबंध पर नियुक्त किया गया था। इस योजना को भारत सरकार 100% वित्तीय सहायता देती थी, लेकिन समय के साथ इस योजना को अन्य मिशनों में समाहित कर दिया गया। बावजूद इसके, इन कर्मचारियों की स्थिति स्थायी नहीं की गई और उन्हें लगातार ठेके पर रखा गया।
मजदूरों की लड़ाई और न्याय की जीत
इस अन्याय के खिलाफ नर्सों ने औद्योगिक न्यायाधिकरण का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने दलील दी कि वे सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में स्थायी कर्मचारियों की तरह ही काम कर रही हैं, लेकिन उन्हें समान वेतन और सुविधाएँ नहीं दी जा रही हैं।
औद्योगिक न्यायाधिकरण ने उनकी बात को सही मानते हुए दिल्ली सरकार को आदेश दिया कि इन कर्मचारियों को स्थायी किया जाए या फिर उन्हें नियमित कर्मचारियों के समान वेतन और लाभ दिए जाएं।
दिल्ली सरकार ने किया कोर्ट का रुख, लेकिन…
दिल्ली सरकार इस आदेश से असहमत थी और उसने हाई कोर्ट में अपील दायर कर न्यायाधिकरण के आदेश को चुनौती दी। सरकार का कहना था कि ये कर्मचारी अनुबंध के आधार पर कार्यरत थे और उन्हें नियमित करने का कोई कानूनी आधार नहीं है।
लेकिन कोर्ट ने इस अपील को खारिज कर दिया और अपने फैसले में कहा कि “अगर कोई कर्मचारी 23-24 सालों तक लगातार सेवा कर रहा है, तो उसे हमेशा के लिए अनुबंध पर नहीं रखा जा सकता। यह एक अन्यायपूर्ण व्यवस्था है और गरीब तथा जरूरतमंद कर्मचारियों का शोषण है।”
कोर्ट का सख्त रुख: आदेश न मानने पर अवमानना की कार्रवाई होगी
हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार को आदेश दिया है कि वह छह हफ्तों के भीतर इस फैसले को लागू करे। अगर सरकार इस आदेश को नहीं मानती, तो उसे अवमानना की कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। उच्च न्यायालय के इस फैसले के खिलाफ दायर की गयी SLP को सुप्रीम कोर्ट ने पहली तारीख पर ही निरस्त कर दिया।
काम तो सरकारी, लेकिन सुविधाएँ ठेका कर्मचारियों जैसी?
यह मामला सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं में ठेका कर्मचारियों के शोषण को उजागर करता है। सरकारें लाखों कर्मचारियों को ‘संविदा’ पर रखकर उनसे स्थायी कर्मचारियों की तरह ही काम लेती हैं, लेकिन उन्हें वेतन और सुविधाओं के मामले में पीछे छोड़ दिया जाता है।
क्या बदलेगी ठेका प्रथा?
हाई कोर्ट का यह फैसला न केवल दिल्ली के स्वास्थ्यकर्मियों के लिए, बल्कि पूरे देश के लाखों संविदा कर्मचारियों के लिए एक मिसाल बन सकता है।
LPA No. 530 /2024
SLP No. 57566 /2024